एआरबी टाइम्स ब्यूरो | शिमला
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (HPU) में आज स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) की विश्वविद्यालय इकाई ने विभिन्न छात्र समस्याओं को लेकर धरना-प्रदर्शन किया और कार्यकारी परिषद (EC) को ज्ञापन सौंपा। SFI ने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय में छात्र आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कैंपस सचिवालय सदस्य अखिल ने कहा कि विश्वविद्यालय को स्थापित हुए 56 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन आज भी छात्र हॉस्टल समस्याओं से जूझ रहे हैं। विश्वविद्यालय में चार लड़कों और नौ छात्राओं के लिए छात्रावास हैं, लेकिन इनमें स्वच्छ पेयजल की कमी के कारण छात्रों को स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

उन्होंने बताया कि हॉस्टलों में लंबे समय से मरम्मत नहीं होने के कारण शौचालय, कमरों की संरचना, पाइपलाइन और पेंटिंग की स्थिति बेहद खराब है। श्रीखंड बॉयज हॉस्टल का सर्वे हुए काफी समय बीत चुका है, लेकिन अब तक इसके नवीनीकरण का कार्य पूरा नहीं हुआ, जिससे कई छात्र हॉस्टल सुविधा से वंचित हैं। SFI ने मांग की कि इसका काम जल्द पूरा किया जाए।
विश्वविद्यालय इकाई के उपाध्यक्ष अमन ने नई शिक्षा नीति (NEP 2020) का विरोध करते हुए कहा कि इसे बिना पर्याप्त चर्चा के लागू किया गया है और इसके माध्यम से शिक्षा का भगवाकरण, निजीकरण और व्यापारीकरण किया जा रहा है। उन्होंने सरकार से इस नीति पर पुनर्विचार करने की मांग की।
उन्होंने परिवहन व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि पहले विश्वविद्यालय में आठ बसें चलती थीं, जो अब घटकर केवल तीन रह गई हैं। जबकि पिछले वर्ष EC में दो नई बसें खरीदने का निर्णय लिया गया था, लेकिन अब तक उस पर अमल नहीं हुआ। इसके चलते छात्रों को निजी बसों पर निर्भर होना पड़ रहा है। SFI ने गैर-शिक्षक कर्मचारियों की भर्ती में देरी पर भी नाराजगी जताई। वर्ष 2019 में निकाले गए भर्ती विज्ञापन के बावजूद अब तक नियुक्तियां नहीं हुईं, जबकि दो बार आवेदन प्रक्रिया में छात्रों से लगभग 4.5 करोड़ रुपये एकत्र किए गए। संगठन ने इसे छात्रों के साथ अन्याय करार दिया और जल्द भर्ती प्रक्रिया पूरी करने की मांग की।
संगठन ने पूर्व कुलपति प्रो. सिकंदर कुमार के कार्यकाल में हुई प्रोफेसर भर्तियों पर भी सवाल उठाए। SFI का आरोप है कि इन भर्तियों में बड़े स्तर पर अनियमितताएं हुई हैं। गणित विभाग की एक भर्ती का मामला उच्च न्यायालय तक पहुंचा, जहां अदालत ने दो प्रोफेसरों की नियुक्ति रद्द कर दी थी। SFI ने इन सभी भर्तियों की न्यायिक जांच की मांग की है। इसके अलावा, संगठन ने विश्वविद्यालय के बजट में कटौती पर भी चिंता जताई। इस वर्ष विश्वविद्यालय को केवल 142 करोड़ रुपये का बजट मिला है, जो आवश्यकताओं के मुकाबले कम है। इससे शोध कार्य प्रभावित हो रहा है और भविष्य में इसका बोझ छात्रों पर पड़ सकता है।
SFI ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं की गई, तो आने वाले समय में छात्र समुदाय को लामबंद कर उग्र आंदोलन किया जाएगा, जिसकी जिम्मेदारी विश्वविद्यालय प्रशासन की होगी।
