एआरबी टाइम्स ब्यूरो | नई दिल्ली \ शिमला
हिमाचल प्रदेश में पंचायतीराज और शहरी निकायों के चुनाव को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को महत्वपूर्ण आदेश जारी किया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य में 31 मई से पहले हर हाल में चुनाव संपन्न कराए जाएं। कोर्ट ने कहा कि पुनर्सीमांकन (डिलिमिटेशन) के नाम पर संवैधानिक संस्थाओं के चुनाव को अनिश्चितकाल तक नहीं टाला जा सकता।
यह फैसला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने सुनाया। हालांकि, अदालत की इस टिप्पणी को राज्य की सुक्खू सरकार के लिए आंशिक राहत के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि इससे पहले हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने 30 अप्रैल तक चुनाव कराने के आदेश दिए थे। अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद सरकार को लगभग एक महीने का अतिरिक्त समय मिल गया है।
हाईकोर्ट के आदेश को दी थी चुनौती
हिमाचल प्रदेश में पंचायतों का कार्यकाल 31 जनवरी को समाप्त हो चुका है। इसके बाद से चुनाव को लेकर कानूनी और राजनीतिक विवाद तेज हो गया था। हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर अधिक समय की मांग की थी। सरकार का तर्क था कि पुनर्सीमांकन और अन्य प्रक्रियात्मक औपचारिकताएं पूरी किए बिना चुनाव संभव नहीं हैं। मामले में पूर्व में भी सुनवाई हो चुकी थी। शुक्रवार को विस्तृत बहस के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना अंतिम रुख स्पष्ट कर दिया और कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्थानीय निकायों का समय पर गठन अनिवार्य है और प्रशासनिक कारणों से चुनाव प्रक्रिया को लंबित नहीं रखा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में दो टूक कहा कि संवैधानिक संस्थाओं की निरंतरता बनाए रखना राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है। चुनाव प्रक्रिया में अनावश्यक देरी लोकतांत्रिक ढांचे के खिलाफ है। प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर पहले ही राजनीतिक माहौल गरमाया हुआ है। विपक्ष सरकार पर चुनाव टालने के आरोप लगा रहा था, जबकि सरकार पुनर्सीमांकन का हवाला दे रही थी। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राज्य चुनाव आयोग को 31 मई से पहले चुनाव प्रक्रिया पूरी करनी होगी। प्रशासनिक स्तर पर तैयारियां तेज होने की संभावना है।




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