एआरबी टाइम्स ब्यूरो, कुल्लू
आपदा के गहरे जख्म झेलने के बाद देवभूमि हिमाचल का कुल्लू जिला एक बार फिर भक्ति, परंपरा और आस्था के सबसे बड़े पर्व का गवाह बनने जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव का आगाज वीरवार से होगा। ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में सजने वाले अनूठे मेले में इस बार 332 देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया है। इनमें से आधे से ज्यादा देवता अपने-अपने देवलुओं संग मैदान में पहुंच चुके हैं और अस्थायी शिविरों में ठहराए गए हैं।

भगवान रघुनाथ जी की रथयात्रा बनेगी आकर्षण
वीरवार सांय साढ़े चार बजे दशहरा महोत्सव की शुरुआत भगवान रघुनाथ जी की भव्य रथयात्रा से होगी। दोपहर करीब दो बजे भगवान रघुनाथ अपने देवालय से ढालपुर के लिए प्रस्थान करेंगे। कहरे पहरे और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच जब भगवान रघुनाथ पालकी में सवार होकर रथ मैदान में पहुंचेंगे, तभी आधिकारिक रूप से उत्सव का शुभारंभ होगा। कुल्लू दशहरा की यह परंपरा करीब 365 वर्षों से चली आ रही है। इसे देवताओं का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है, जहां आस्था और संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
सुरक्षा के लिए 1200 से अधिक पुलिस जवान तैनात
उत्सव के पहले दिन हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बनेंगे। दशहरा उत्सव समिति के अध्यक्ष एवं विधायक सुंदर सिंह ठाकुर ने बताया कि मेले के लिए सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। सुरक्षा के मद्देनजर 1,200 पुलिस जवानों की तैनाती की गई है। भीड़ पर नजर रखने के लिए ड्रोन और सीसीटीवी कैमरे भी लगाए गए हैं, ताकि किसी भी स्थिति पर तुरंत नियंत्रण पाया जा सके।
इस बार झलकेगी हिमाचली संस्कृति
हालिया आपदा के चलते इस बार दशहरा महोत्सव की रात्रि संध्याओं में विदेशी संस्कृति या बॉलीवुड कलाकारों की प्रस्तुतियां नहीं होंगी। आयोजकों ने फैसला लिया है कि इस बार पूरा फोकस हिमाचली संस्कृति और लोक कलाकारों पर रहेगा। संध्याओं में पारंपरिक नृत्य, लोकगीत और पहाड़ी धुनें माहौल को भक्ति और संस्कृति से सराबोर करेंगी। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा सिर्फ एक सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि देवभूमि की परंपराओं का जीवंत प्रतीक है। भगवान रघुनाथ की रथयात्रा में शामिल होने वाले सैकड़ों देवी-देवता अपने अनुयायियों के साथ यहां पहुंचते हैं। यह नजारा भक्ति, आस्था और परंपरा का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है। कुल्लू दशहरा उत्सव 2025 आपदा के साये में जरूर आयोजित हो रहा है, लेकिन इसके बावजूद यह हिमाचल की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को नए सिरे से संजोने का अवसर बनेगा। देवताओं के दरबार और रघुनाथ जी की रथयात्रा के साथ यह पर्व एक बार फिर पूरे देश-दुनिया को कुल्लू की संस्कृति से रूबरू कराएगा।
