एआरबी टाइम्स ब्यूरो | शिमला
हिमाचल हाईकोर्ट ने पंचायतीराज चुनाव से जुड़े एक अहम मामले में राज्य सरकार के उस संशोधित प्रावधान पर तत्काल रोक लगाने से इंकार कर दिया है, जिसके तहत यदि किसी महिला के सास-ससुर सरकारी जमीन पर अतिक्रमण के दोषी पाए जाते हैं, तो वह पंचायत चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य मानी जाएगी।
यह मामला शुक्रवार को हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी महिला को इस सरकारी निर्णय से वास्तविक नुकसान हुआ है, तो उसे स्वयं अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहिए। केवल जनहित के आधार पर इस प्रकार की याचिका पर हस्तक्षेप करना उचित नहीं माना जा सकता। यह जनहित याचिका एक महिला मंडल की ओर से दायर की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने सरकार के हालिया फैसले को चुनौती देते हुए कहा था कि पंचायतीराज अधिनियम की धारा 122 में किया गया संशोधन महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ है।
👉 यह भी पढ़ें : Himachal Panchayat Election 2026 : सरकारी जमीन पर ससुर का कब्जा होने पर बहू नहीं लड़ सकेगी चुनाव, आशा वर्करों को हाईकोर्ट से राहत
कहा- अगर कोई बहू चुनाव लड़ने से वंचित हो रही है तो खुद आकर दायर करे याचिका
सुनवाई के दौरान अदालत ने सबसे पहले याचिका की वैधानिकता और उसकी मेंटेनेबिलिटी पर सवाल उठाया। अदालत ने पूछा कि क्या याचिकाकर्ता इस संशोधित नियम से सीधे तौर पर प्रभावित हैं। याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से दलील दी गई कि यह मामला व्यापक जनहित से जुड़ा है और ग्रामीण महिलाओं की चुनावी पात्रता को प्रभावित करता है। हालांकि अदालत इस तर्क से संतुष्ट नहीं हुई। खंडपीठ ने कहा कि यदि कोई महिला इस संशोधित नियम के कारण पंचायत चुनाव लड़ने से वंचित हो रही है, तो वह व्यक्तिगत रूप से याचिका दायर कर सकती है। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।
👉 यह भी पढ़ें : Himachal Panchayat Elections 2026 : नया कानून लागू, चिट्टा मामलों में संलिप्त लोग नहीं लड़ सकेंगे चुनाव
याचिका में यह कहा गया
याचिका में कहा गया था कि सरकार ने पंचायतीराज अधिनियम की धारा 122 में संशोधन कर “परिवार” की परिभाषा का दायरा बढ़ा दिया है। संशोधन के अनुसार अब यदि किसी महिला के सास-ससुर सरकारी भूमि पर अतिक्रमण के दोषी पाए जाते हैं, तो वह महिला पंचायत चुनाव नहीं लड़ सकेगी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह संशोधन पंचायत चुनाव के लिए नामांकन प्रक्रिया शुरू होने से ठीक एक दिन पहले लागू किया गया। इससे चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही कई महिलाओं के सामने अचानक कानूनी बाधा खड़ी हो गई। पहले की व्यवस्था में पंचायतीराज अधिनियम, 1994 की धारा 122 के तहत परिवार की परिभाषा में दादा-दादी, माता-पिता, पति-पत्नी, बेटा-बेटी और अविवाहित बेटी को शामिल किया गया था। बहू का इसमें उल्लेख नहीं था। इसी कारण पहले ऐसी महिलाएं चुनाव लड़ने के लिए पात्र मानी जाती थीं, भले ही उनके सास-ससुर पर अतिक्रमण का आरोप हो।
