हिमाचल प्रदेश सरकार ने प्रदेश में बढ़ते भूस्खलन, प्राकृतिक आपदाओं और भवन सुरक्षा को देखते हुए भवन निर्माण नियमों को और सख्त कर दिया है। अब शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में तीन मंजिला से अधिक भवन निर्माण के लिए स्ट्रक्चर इंजीनियर की रिपोर्ट अनिवार्य होगी। वहीं, ढाई मंजिला भवन के निर्माण के लिए स्ट्रक्चर स्टेबिलिटी प्रमाण पत्र लेना भी जरूरी होगा। इन दस्तावेजों के बिना किसी भी भवन को वैध नहीं माना जाएगा।
टीसीपी रूल्स में संशोधन
सरकार ने यह बदलाव हिमाचल प्रदेश टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (एचपीटीसीपी) रूल्स-21 में किया है। इससे पहले यह नियम केवल सरकारी भवनों पर लागू था, लेकिन अब इसे निजी भवन निर्माण के लिए भी अनिवार्य कर दिया गया है। सरकार का कहना है कि प्रदेश की भौगोलिक स्थिति संवेदनशील है, और बिना तकनीकी सलाह के बनाए गए भवन भविष्य में गंभीर खतरा बन सकते हैं।
इंजीनियरिंग मानकों की अनदेखी से हो रहा नुकसान
हिमाचल प्रदेश में हाल के वर्षों में भारी बारिश, बादल फटने, भूस्खलन और बाढ़ जैसी घटनाओं में सैकड़ों मकान क्षतिग्रस्त हुए हैं। इन घटनाओं से स्पष्ट हुआ कि भवन निर्माण में वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग मानकों की अनदेखी भारी नुकसान का कारण बन रही है।
सरकार ने कहा कि अब लोग योग्य स्ट्रक्चर इंजीनियरों की सलाह से सुरक्षित भवन निर्माण कर सकेंगे। केंद्र सरकार की टीमों ने भी प्रदेश का दौरा कर अपनी रिपोर्ट में स्ट्रक्चर इंजीनियर की भूमिका और स्ट्रक्चर स्टेबिलिटी प्रमाण पत्र को अनिवार्य करने की सिफारिश की थी।
नालों और नदियों से दूरी का नियम
टीसीपी विभाग ने प्रमुख शहरों और कस्बों के लिए डेवलपमेंट प्लान तैयार किए हैं, जिनमें शिमला, कुल्लू, धर्मशाला, ऊना, मंडी, सोलन, नाहन और चंबा शामिल हैं। भवनों की ऊंचाई, सड़क की चौड़ाई और आसपास की भौगोलिक स्थिति के अनुसार निर्माण की अनुमति दी जाएगी। सरकार ने नालों, खड्डों और नदियों के किनारे भवन निर्माण के लिए भी सख्त नियम बनाए हैं। अब नालों से कम से कम 5 मीटर और नदियों व खड्डों से 7 मीटर दूरी छोड़कर ही भवन निर्माण की अनुमति दी जाएगी।

