एआरबी टाइम्स ब्यूरो, शिमला | हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्ग-5 (NH-5) और किन्नौर जिले में ठोस कचरा प्रबंधन नियमों के उल्लंघन और जलविद्युत परियोजनाओं (Hydro Projects) के कारण पर्यावरण को हो रहे भारी नुकसान पर कड़ा संज्ञान लिया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने सौरव कुमार नेगी की ओर से दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार, पर्यावरण विभाग और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई 17 अगस्त 2026 को होगी।
‘लाडा’ और ‘सीएसआर’ के 2% फंड पर होगी न्यायिक निगरानी
हाईकोर्ट ने इस मामले को पूरी तरह न्यायिक निगरानी के योग्य बताते हुए टिप्पणी की कि सभी हाइड्रो प्रोजेक्ट राज्य को 12 फीसदी मुफ्त बिजली देते हैं। इसके अलावा प्रभावित क्षेत्र के लिए 1 फीसदी अतिरिक्त बिजली और राज्य सरकार से 1 फीसदी मैचिंग ग्रांट का प्रावधान है। अदालत अब यह जांचेगी कि लोकल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (LADA) और कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) के इस कुल दो फीसदी फंड का इस्तेमाल किन्नौर के विकास और प्रभावितों के लिए कैसे किया जा रहा है। साथ ही कैंपा (CAMPA) परियोजना के तहत मिलने वाले कॉर्पस फंड का ब्योरा भी अदालत ने सरकार से मांगा है।
ब्लास्टिंग से तबाह हो रहे सेब के बगीचे
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि किन्नौर में हाइड्रो प्रोजेक्ट्स द्वारा की जा रही अंधाधुंध ब्लास्टिंग और उससे उड़ने वाली धूल के कारण स्थानीय आर्थिकी की रीढ़ यानी सेब के बगीचे पूरी तरह तबाह हो रहे हैं। याचिका में बागवानी विभाग और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से संयुक्त नुकसान मूल्यांकन (Joint Damage Assessment) कराने की मांग की गई है। इसके अलावा ठोस कचरा प्रबंधन नियम-2026 को लागू करने, स्थानीय युवाओं के लिए ‘ग्रीन जॉब्स’ सुरक्षित करने और राजस्व को मिलाकर एक ‘ट्राइबल इको-ग्रिड पर्यावरण और आजीविका कोष’ बनाने का आग्रह भी कोर्ट से किया गया है।
