एआरबी टाइम्स ब्यूरो, शिमला | राजधानी शिमला के उपनगर संजौली की बंगाला कॉलोनी में वन और सरकारी भूमि पर अतिक्रमण के मामले में Himachal High Court ने कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने नगर निगम शिमला को बिना स्वीकृत भवन नक्शे के बनाए गए अपने वार्ड कार्यालय को खुद ध्वस्त करने का आदेश दिया है। यह मामला वन भूमि पर अतिक्रमण, अवैध निर्माण और देवदार के पेड़ों को नुकसान पहुंचाने से संबंधित जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया।
वन भूमि पर बने 23 ढांचे हटाने के निर्देश
Himachal High Court ने वन भूमि पर बने 23 अवैध ढांचों, जिनका कुल क्षेत्रफल 822.52 वर्ग मीटर बताया गया है, को हटाने के लिए कलेक्टर-कम-डीएफओ के समक्ष लंबित मामलों में तेजी लाने को कहा है। वहीं, नगर निगम की भूमि पर बने 10 अन्य अवैध ढांचों के संबंध में भी नियमानुसार बेदखली की प्रक्रिया तत्काल शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं। पीठ ने संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय करने को भी कहा है। अदालत ने इस बात पर गंभीर आपत्ति जताई कि बिना भवन नक्शा स्वीकृत कराए और वन भूमि से जुड़े मामले के बावजूद सार्वजनिक धन से निर्माण कराया गया और उसका उद्घाटन भी कर दिया गया।
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अनियमितता को नियमित करने की दलील अस्वीकार
सुनवाई के दौरान Himachal High Court ने नगर निगम की उस दलील को स्वीकार नहीं किया, जिसमें कथित अनियमितता को नजरअंदाज करने या बाद में नियमित करने की बात कही गई थी। पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जब नियम लागू करने वाली संस्था ही अनधिकृत निर्माण में शामिल हो जाए तो इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने 15 अक्टूबर 2013 की अधिसूचना के आधार पर खसरा नंबर 443, 444 और 1662 की वन भूमि का इंतकाल तत्काल वन विभाग के नाम दर्ज करने के निर्देश भी दिए हैं।
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वन भूमि पर 23 और एमसी की भूमि पर 10 अवैध निर्माण
बता दें कि Himachal High Court ने मामले में जिला कानूनी सेवाएं प्राधिकरण (DLSA) शिमला के सचिव और एसडीएम शिमला को संबंधित क्षेत्र का निरीक्षण करने के निर्देश दिए गए थे। निरीक्षण के बाद पेश रिपोर्ट में वन भूमि पर 23 और नगर निगम की भूमि पर 10 अवैध निर्माण पाए गए। रिपोर्ट के अनुसार नगर निगम शिमला का वार्ड कार्यालय खसरा नंबर 464 पर बनाया गया है। इसके लिए भवन योजना स्वीकृत नहीं कराई गई थी। रिकॉर्ड के अनुसार कार्यालय का उद्घाटन 17 अक्टूबर 2015 को हुआ था। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि संबंधित भूमि का स्वामित्व 2013 की अधिसूचना के तहत वन विभाग को स्थानांतरित किया जा चुका था। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को होगी।
