एआरबी टाइम्स ब्यूरो, मंडी
हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले मंडी में मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही देव परंपरा का जीवंत स्वरूप है। छोटी काशी के नाम से विख्यात यह नगरी हर वर्ष उस ऐतिहासिक क्षण की साक्षी बनती है, जब सैकड़ों देवी-देवता अपने रथों और पालकियों में विराजमान होकर नगर में प्रवेश करते हैं।
यह परंपरा लगभग सैंकड़ों वर्ष पूर्व से चली आ रही मानी जाती है, जब तत्कालीन राजा ने राज्य के आराध्य देवता को नगर में स्थापित कर सभी स्थानीय देवताओं को आमंत्रित करने की परंपरा प्रारंभ की थी। तभी से देव समागम की यह अनूठी परंपरा निरंतर निभाई जा रही है। आज भी 200 से अधिक देवी-देवताओं का एक स्थान पर एकत्र होना इस प्राचीन लोक आस्था की शक्ति को दर्शाता है।

देव समागम का सबसे महत्वपूर्ण और भावनात्मक क्षण वह होता है जब राज देवता देव माधो राय और जनपद के आराध्य देव कमरू नाग का मिलन होता है। इस मिलन को उत्सव का शुभारंभ माना जाता है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाई जाती है, जिसे देखने के लिए दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंचते हैं। नगर की गलियों में जब नगाड़े, करनाल, रणसिंघे और ढोल की गूंज सुनाई देती है, तो यह केवल संगीत नहीं बल्कि लोक संस्कृति की विरासत का स्वर होता है। देव वाद्यों की यह ध्वनि पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती आई है और आज भी वही ऊर्जा और अनुशासन लिए हुए है।
स्थानीय लोगों के लिए यह उत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने का माध्यम है। यहां परंपरा आधुनिकता के साथ कदम मिलाकर चलती है, लेकिन मूल स्वरूप अक्षुण्ण रहता है। जिला प्रशासन भी इस ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित और व्यवस्थित रूप से संचालित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस प्राचीन देव संस्कृति का अनुभव कर सकें। मंडी का शिवरात्रि महोत्सव हर वर्ष यह संदेश देता है कि परंपराएं केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान की शक्ति हैं—और जब आस्था सदियों पुरानी हो, तो उसका उत्सव भी अलौकिक हो जाता है।
