एआरबी टाइम्स ब्यूरो | रामपुर बुशहर
केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों और संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर बुधवार, 1 अप्रैल 2026 को देशभर में चार श्रम संहिताओं के विरोध में ‘काला दिवस’ मनाया गया। इसी क्रम में सीटू से संबंधित यूनियनों ने निरथ, बिथल, बायल, झाकड़ी और रामपुर सहित कई क्षेत्रों में प्रदर्शन किए।
प्रदर्शन के दौरान मजदूरों ने काली पट्टियां पहनकर सरकार की कथित मजदूर विरोधी नीतियों के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की।
इस मौके पर सीटू शिमला जिला अध्यक्ष कुलदीप डोगरा, महासचिव अमित, किसान नेता देवकीनंद, रंजीत ठाकुर, छात्र नेता राहुल विद्यार्थी, मिलाफ, लुहरी हाइड्रो से राजपाल, अजय शर्मा, मंजीत, 412 मेगावाट परियोजना से संजीव, प्रमोद, तिलक, 1500 मेगावाट परियोजना से कामराज, राजकुमार, तिलक, रामपुर नगर परिषद से देवेंद्र, खनेरी अस्पताल से आशा और सुनमणि सहित कई नेताओं ने प्रदर्शन को संबोधित किया।
वक्ताओं ने चारों श्रम संहिताओं को लेकर कहा कि सरकार द्वारा इन्हें “मजदूर हितैषी” बताना भ्रामक है। उन्होंने वेतन संहिता 2019 की धारा 2(y) और 2(n) का हवाला देते हुए कहा कि इन प्रावधानों के कारण बड़ी संख्या में मजदूर न्यूनतम वेतन के दायरे से बाहर रह जाते हैं। साथ ही, धारा 6 में वेतन निर्धारण के लिए कोई वैज्ञानिक मानक तय नहीं किया गया है, जिससे मनमाने ढंग से वेतन तय करने की आशंका बनी रहती है।
नेताओं ने धारा 9 (फ्लोर वेज) पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन तय करने का अधिकार तो दिया गया है, लेकिन इसके लिए कोई स्पष्ट और बाध्यकारी फार्मूला नहीं है।
सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 को लेकर उन्होंने कहा कि धारा 109 से 114 केवल योजनाओं तक सीमित हैं और मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं देतीं। EPF और ESI जैसी सुविधाएं भी सीमित दायरे में हैं, जिससे बड़ी संख्या में मजदूर वंचित हैं।
औद्योगिक संबंध संहिता 2020 के तहत Fixed Term Employment को वैध बनाने पर भी नेताओं ने चिंता जताई। उनका कहना था कि इससे स्थायी रोजगार कमजोर होता है और नौकरी की असुरक्षा बढ़ती है।
ट्रेड यूनियन अधिकारों पर भी सवाल उठाते हुए कहा गया कि यूनियन पंजीकरण के लिए 10% या 100 मजदूरों की अनिवार्य सदस्यता छोटे यूनियनों के गठन में बाधा बनती है। वहीं, हड़ताल के अधिकार को भी 14 दिन के नोटिस और सख्त प्रावधानों के जरिए कमजोर किया गया है।
व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशा संहिता 2020 के तहत कार्य घंटों को लेकर अस्पष्टता पर भी चिंता व्यक्त की गई। नेताओं का कहना था कि इससे मजदूरों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
मजदूर और किसान नेताओं ने कहा कि इन सभी प्रावधानों से न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा, स्थायी रोजगार, ट्रेड यूनियन अधिकार और हड़ताल के अधिकार कमजोर हुए हैं।
गेट मीटिंग में बड़ी संख्या में मजदूरों ने भाग लिया और मजदूर विरोधी नीतियों के खिलाफ संघर्ष तेज करने का संकल्प लिया। अंत में यूनियन नेतृत्व ने एकजुट होकर संघर्ष जारी रखने का आह्वान करते हुए कहा— “अधिकार कभी दिए नहीं जाते, उन्हें संघर्ष से हासिल करना पड़ता है।”
