एआरबी टाइम्स ब्यूरो
शिमला। ओडिशा के बालासोर स्थित कॉलेज की छात्रा एवं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) की सक्रिय कार्यकर्ता की आत्मदाह से हुई दर्दनाक मृत्यु ने समूचे शिक्षा जगत और छात्र समुदाय को झकझोर कर रख दिया है।
कॉलेज के शिक्षा विभागाध्यक्ष द्वारा मानसिक और यौन उत्पीड़न से छात्रा ने जब साहस दिखाते हुए कॉलेज प्राचार्य को लिखित शिकायत सौंपी, तो संस्थान ने दोषी शिक्षक के विरुद्ध कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। इसके उलट, आंतरिक शिकायत समिति (ICC) की आड़ में पीड़िता को ही दोषी ठहराने का प्रयास किया गया।
इतना ही नहीं, एन.एस.यू.आई. से जुड़े कुछ छात्रों ने भी छात्रा पर झूठे आरोप लगाए और सार्वजनिक रूप से उनका चरित्र हनन किया। जब 12 जुलाई को प्राचार्य ने छात्रा को यह कहकर निराश किया कि, “रिपोर्ट शिक्षक के पक्ष में है, समझौता कर लो,” तो उन्होंने कॉलेज परिसर में आत्मदाह कर लिया। अंततः 14 जुलाई की रात को AIIMS भुवनेश्वर में उन्होंने दम तोड़ दिया।
यह घटना केवल व्यक्तिगत उत्पीड़न की कहानी नहीं, बल्कि यह हमारे शिक्षण संस्थानों में फैली संस्थागत संवेदनहीनता, यौन हिंसा पर मौन और दोषियों को संरक्षण देने की भयावह प्रवृत्ति को उजागर करती है। यह इस सच्चाई को सामने लाती है कि जब छात्राएं न्याय की अपेक्षा में संस्थागत दरवाज़े खटखटाती हैं, तो उन्हें ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।
इस अमानवीय घटना के विरोध में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने देशव्यापी श्रद्धांजलि सभाओं, मोमबत्ती मार्च, हस्ताक्षर अभियानों और धरना-प्रदर्शनों की घोषणा की है। विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता देशभर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्रा को न्याय दिलाने की मुहिम चला रहे हैं।
अभाविप शिमला के जिला संयोजक दिविज ठाकुर ने कहा,
“छात्रा की मृत्यु सिर्फ एक छात्रा की त्रासदी नहीं, बल्कि यह संस्थानों की नैतिक विफलता और मौन मिलीभगत का परिणाम है। एक ओर वह शिक्षक जिन्होंने उत्पीड़न किया, और दूसरी ओर एन.एस.यू.आई. जैसे छात्र संगठनों के लोग जिन्होंने पीड़िता को ही अपमानित किया—दोनों ही समान रूप से अपराधी हैं। यदि शिक्षण संस्थान यौन उत्पीड़न के मामलों में चुप रहेंगे, तो विद्यार्थी परिषद कभी मौन नहीं रहेगी। हम न्याय सुनिश्चित करने के लिए सभी कानूनी और जन-संगठनात्मक प्रयास करेंगे।”