एआरबी टाइम्स ब्यूरो | शिमला।
हिमाचल हाईकोर्ट ने ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक व पारंपरिक रास्तों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि गांवों में लंबे समय से उपयोग किए जा रहे पारंपरिक और सार्वजनिक रास्तों को कोई भी व्यक्ति बंद नहीं कर सकता है, फिर चाहे वह रास्ता उसकी निजी जमीन से ही होकर क्यों न गुजरता हो। हिमाचल हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी साफ किया कि ऐसे संवेदनशील मामलों में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए एसडीएम को सीधे हस्तक्षेप करने और तत्काल दंडात्मक कार्रवाई करने का पूर्ण कानूनी अधिकार है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला किन्नौर जिले की सांगला तहसील के तहत आने वाले बटसेरी गांव का है। गांव के स्थानीय शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि कुछ रसूखदार याचिकाकर्ताओं ने खसरा नंबर 720 में स्थित एक पारंपरिक रास्ते को अवरुद्ध (बंद) कर दिया है। ग्रामीणों का तर्क था कि वे इस रास्ते का उपयोग पिछले 70-80 वर्षों से अपने खेतों, घरों, श्मशान घाट तक जाने और स्थानीय देवी-देवताओं की पवित्र पालकी (जलेब) ले जाने के लिए निरंतर करते आ रहे हैं। इसके बाद मामला एसडीएम कल्पा की अदालत में पहुंचा तो उन्होंने तहसीलदार की जमीनी रिपोर्ट और स्थानीय गवाहों के बयानों के आधार पर जून 2023 में रास्ते से तत्काल अवरोध हटाने के निर्देश जारी किए थे। याचिकाकर्ताओं ने एसडीएम के इसी आदेश को हिमाचल हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
कानून और ‘वाजिब-उल-अर्ज’ का हवाला
मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायाधीश संदीप शर्मा की एकल पीठ ने एसडीएम कल्पा के आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा। अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि जब किसी रास्ते के उपयोग को लेकर विवाद से शांति भंग होने की आशंका हो और ग्रामीणों का उस रास्ते पर ‘लंबे समय से स्थापित उपयोग का अधिकार हो, तब दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 147 के तहत एसडीएम को कार्रवाई करने की शक्ति है। स्थानीय प्रथागत कानूनों यानी ‘वाजिब-उल-अर्ज’ के तहत मान्यता प्राप्त पारंपरिक रास्तों को खुद भू-स्वामी भी अपनी मर्जी से बंद नहीं कर सकता। अदालत ने माना कि विवादित भूमि भले ही याचिकाकर्ताओं की निजी सह-स्वामित्व वाली जमीन है, लेकिन ग्रामीणों ने कभी उस भूमि के मालिकाना हक (ओनरशिप) पर दावा नहीं किया। उनका दावा सिर्फ और सिर्फ रास्ते के उपयोग के अधिकार तक सीमित था।
