एआरबी टाइम्स ब्यूरो | शिमला
हिमाचल प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था में एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सरकार की भर्ती नीति, विशेषज्ञ डॉक्टरों के सम्मान और सुपर स्पेशलिटी सेवाओं के भविष्य तीनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुपर स्पेशलिटी अस्पताल चमियाना के न्यूरो सर्जरी विभाग के लिए एक डॉक्टर को एमओ सर्जरी (जॉब ट्रेनी) का ऑफर दिया गया है और मासिक मानदेय मात्र ₹33,600। बड़ी बात यह है कि यही डॉक्टर आईजीएमसी में एमसीएच (मास्टर ऑफ चिरूर्जिया) करते समय सीनियर रेजिडेंट के रूप में सरकार से ₹1.30 लाख प्रतिमाह स्टाइपेंड ले रहा था यानी विशेषज्ञता पूरी होते ही आय में सीधा एक लाख रुपये की गिरावट। सवाल यह है क्या यही है सुपर स्पेशलिटी डॉक्टरों को आकर्षित करने की नीति?, क्या सरकार उच्च शिक्षा पूरी कर चुके सर्जनों को ट्रेनी मान रही है?
एमसीएच के बाद ट्रेनी का टैग
एमसीएच कोई साधारण डिग्री नहीं, बल्कि एमबीबीएस, एमएस के बाद वर्षों की कठिन ट्रेनिंग का परिणाम है। कुल मिलाकर एक न्यूरोसर्जन बनने में कई साल की पढ़ाई और प्रशिक्षण लगता है। इसके बावजूद ऐसे डॉक्टर को जॉब ट्रेनी बनाकर 33 हजार रुपये देना चिकित्सकों के अनुसार योग्यता का अपमान है। फैकल्टी एसोसिएशन, चमियाना ने इस सर्जन के पद और एमसीएच जैसी उच्च डिग्री का मजाक करार दिया है। न्यूरो सर्जरी विभाग में 6 सीनियर रेजिडेंट के पद खाली हैं। इसके अलावा, 3 कंसलटेंट के पद रिक्त हैं। इतनी कमी के बावजूद विशेषज्ञ डॉक्टर को आकर्षक पैकेज देने के बजाय “ट्रेनी” का दर्जा देना बताता है कि समस्या सिर्फ स्टाफ की कमी नहीं, बल्कि नीति की सोच में है।
सुपर स्पेशलिटी अस्पताल या ट्रेनी सेंटर?
सरकार चमियाना को सुपर स्पेशलिटी हब बताती है, लेकिन 24 घंटे इमरजेंसी अभी शुरू नहीं है। कई विशेषज्ञों के पद खाली हैं और जो विशेषज्ञ उपलब्ध हैं, उन्हें ट्रेनी मानदेय पर रखने की तैयारी है। यह मॉडल अगर जारी रहा तो बड़ा सवाल यह है कि क्या योग्य डॉक्टर हिमाचल में रुकेंगे या निजी क्षेत्र और अन्य राज्यों का रुख करेंगे? युवा डॉक्टरों ने इसे बेरोजगारों और विशेषज्ञों के साथ मजाक बताया है। उनका कहना है कि जब प्रशिक्षण के दौरान स्टाइपंड अधिक था, तो डिग्री पूरी करने के बाद मानदेय कम कैसे हो सकता है? उधर, एसोसिएशन इस मामले को मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के समक्ष उठाने जा रही है। मांग साफ है कि मानदेय कम से कम पूर्व स्टाइपेंड के बराबर हो और विशेषज्ञ डॉक्टरों को ट्रेनी श्रेणी में न रखा जाए
