एआरबी टाइम्स ब्यूरो, शिमला | हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के प्रसिद्ध कमला नेहरू अस्पताल (KNH) में वर्ष 2016 में हुए चर्चित नवजात अदला-बदली मामले में अदालत ने अहम फैसला सुनाया है। सिविल जज (कोर्ट नंबर-5) सुष्मिता शर्मा की अदालत ने प्रसव के दौरान हुई गंभीर लापरवाही के लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए पीड़ित महिला शीतल ठाकुर को 30 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है।
कैसे हुई नवजात की अदला-बदली?
संजौली (शिमला) की रहने वाली शीतल ठाकुर को 26 मई 2016 को प्रसव के लिए केएनएच अस्पताल में भर्ती कराया गया था। देर रात लेबर रूम में प्रसव के बाद ड्यूटी पर तैनात कर्मचारियों ने परिजनों को बेटा होने की सूचना दी। हालांकि, थोड़ी ही देर बाद परिजनों को एक नवजात बच्ची सौंप दी गई, जिसके कपड़े भी बदले हुए थे। परिजनों ने तुरंत अस्पताल कर्मचारियों के समक्ष इस गड़बड़ी पर कड़ी आपत्ति जताई, लेकिन अस्पताल प्रशासन ने उनकी शिकायत को नजरअंदाज कर दिया और कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
डीएनए जांच और हाईकोर्ट का हस्तक्षेप
अस्पताल के अड़ियल रवैये के बाद पीड़ित दंपती ने निजी लैब में डीएनए (DNA) जांच कराई, जिससे यह साबित हुआ कि सौंपी गई बच्ची उनकी जैविक संतान नहीं है। मामला तूल पकड़ने पर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के हस्तक्षेप से कानूनी प्रक्रिया के तहत दोनों नवजातों का आधिकारिक डीएनए मिलान करवाया गया। रिपोर्ट के आधार पर असली जैविक माता-पिता की पहचान हुई और शीतल ठाकुर को उनका बेटा वापस मिल सका। इसके बाद पीड़ित परिवार ने मानसिक उत्पीड़न और लापरवाही के खिलाफ मुआवजे के लिए सिविल कोर्ट का रुख किया।
सरकारी जांच रिपोर्ट खारिज, कोर्ट ने माना मानसिक उत्पीड़न
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश आंतरिक जांच रिपोर्ट को अदालत ने पूरी तरह अविश्वसनीय मानकर खारिज कर दिया। कोर्ट ने पाया कि रिपोर्ट में न तो कोई तारीख दर्ज थी और न ही गवाहों के बयानों का स्पष्ट उल्लेख था। अदालत ने माना कि अस्पताल की भूल के कारण माता-पिता लंबे समय तक अपने मासूम बच्चे के प्राकृतिक प्यार से वंचित रहे।
