शिमला | Himachal High Court ने नौतोड़ भूमि से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि केवल शादीशुदा होने के आधार पर किसी बेटी को उसके माता-पिता की कानूनी वारिस के रूप में भूमि का पट्टा देने से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने एडीएम शिमला के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें शादीशुदा बेटी के आवेदन को खारिज किया गया था। न्यायमूर्ति संदीप शर्मा की अदालत ने सरकार को याचिकाकर्ता के नाम जमीन का पट्टा जारी करने की प्रक्रिया दो महीने के भीतर पूरी करने का आदेश दिया।
1972 में पिता को मिली थी तीन बीघा से अधिक जमीन
जानकारी के अनुसार, वर्ष 1972 में चाैपाल की शांति के पिता मीना राम को नौतोड़ योजना के तहत 3 बीघा 2 बिस्वा जमीन मंजूर की गई थी। सरकार से जमीन स्वीकृत होने के बाद मीना राम को इसका कब्जा भी मिल गया था हालांकि, राजस्व अधिकारियों की ओर से पट्टे की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी और सरकारी दस्तावेज पर आवश्यक हस्ताक्षर नहीं हुए। मीना राम की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने पट्टा जारी करने के लिए आवेदन किया। पट्टा दोबारा तैयार किया गया, लेकिन इस बार भी प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई।
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मां की मौत के बाद शांति रह गईं अकेली वारिस
वर्ष 2012 में मां के निधन के बाद शांति परिवार की अकेली वारिस रह गईं। वह संबंधित जमीन पर खेती करती रहीं। वर्ष 2023 में उन्होंने प्रशासन के समक्ष जमीन का पट्टा अपने नाम करने का अनुरोध किया। हालांकि, 1 जनवरी 2024 को एडीएम शिमला ने उनका आवेदन खारिज कर दिया। आदेश में वर्ष 1980 के एक सरकारी निर्देश का हवाला देते हुए कहा गया था कि शादीशुदा बेटी को नौतोड़ भूमि का पट्टा नहीं दिया जा सकता। इसके बाद शांति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और प्रशासन के आदेश को चुनौती दी।
कोर्ट ने कहा- 1980 का पत्र नियम नहीं बदलता
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि वर्ष 1980 का पत्र केवल एक प्रशासनिक स्पष्टीकरण था। हिमाचल प्रदेश नौतोड़ लैंड रूल्स, 1968 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके आधार पर विवाहित बेटी को अपने माता-पिता की कानूनी वारिस के तौर पर नौतोड़ भूमि का पट्टा प्राप्त करने से रोका जा सके। अदालत ने एडीएम शिमला के आदेश को निरस्त करते हुए राज्य सरकार को याचिकाकर्ता के नाम पट्टा जारी करने की प्रक्रिया पूरी करने का आदेश दिया।
