एआरबी टाइम्स ब्यूरो | शिमला
हिमाचल प्रदेश में किसानों के हितों को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। राज्य सरकार की ओर से प्रस्तावित हिमाचल प्रदेश राज्य किसान आयोग के गठन का रास्ता साफ हो गया है। राज्यपाल ने विधानसभा से पारित विधेयक को मंजूरी दे दी है, जिसके बाद नया कानून लागू हो गया है। विधि विभाग ने इसकी अधिसूचना भी जारी कर दी है।
कृषि, बागवानी और पशुपालन गतिविधियों पर रखेगा नजर
नए राज्य किसान आयोग का दायरा व्यापक होगा। आयोग कृषि, बागवानी, पशुपालन, मत्स्य पालन, दुग्ध उत्पादन, औषधीय पौधों की खेती, मधुमक्खी पालन, रेशम उत्पादन, खाद्य, चारा और रेशा उत्पादन समेत विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े कार्यों की निगरानी करेगा। किसानों की समस्याओं और कृषि क्षेत्र के विकास से जुड़े मुद्दों पर आयोग सरकार को सुझाव भी देगा। आयोग में कृषि और बागवानी विश्वविद्यालयों के कुलपति, बागवानी विभाग, पशुपालन विभाग और मत्स्य विभाग के निदेशक पदेन सदस्य होंगे। वहीं कृषि विभाग के निदेशक आयोग के सदस्य सचिव की जिम्मेदारी संभालेंगे।
कौन बन सकता है राज्य किसान आयोग का अध्यक्ष?
कानून के अनुसार आयोग का अध्यक्ष हिमाचल प्रदेश का स्थायी निवासी होगा। अध्यक्ष ऐसा प्रगतिशील या व्यावसायिक किसान होना चाहिए, जिसके पास कम से कम स्नातक की डिग्री हो और घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय कृषि परिदृश्य का पर्याप्त ज्ञान हो। इसके अलावा कृषि, बागवानी या पशुपालन क्षेत्र में कम से कम पांच वर्ष का प्रशासनिक अनुभव अनिवार्य होगा। मार्केटिंग बोर्ड, एपीएमसी या सहकारी बैंक के प्रबंध निदेशक के रूप में कार्य करने का अनुभव भी इस पात्रता में शामिल माना जाएगा। राज्य किसान आयोग के अध्यक्ष और गैर-सरकारी सदस्य अधिकतम पांच वर्ष या 70 वर्ष की आयु पूरी होने तक अपने पद पर बने रह सकेंगे। आयोग को जांच करने, रिपोर्ट तैयार करने और आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने की शक्तियां भी प्रदान की गई हैं। राज्य किसान आयोग के गठन से प्रदेश के किसानों, बागवानों और पशुपालकों से जुड़े मुद्दों के समाधान को संस्थागत रूप मिलेगा। साथ ही कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में नीतिगत सुधारों तथा किसानों के हितों की सुरक्षा के लिए आयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
