एआरबी टाइम्स ब्यूरो | रामपुर बुशहर
रामपुर क्षेत्र के झाकड़ी, दत्तनगर, बिथल, नीरथ, नाथपा और किसान मजदूर भवन चाटी में सीटू से संबद्ध विभिन्न यूनियनों ने अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस उत्साह और एकजुटता के साथ मनाया। इस अवसर पर मजदूरों ने केंद्र की मोदीनीत एनडीए सरकार की कथित मजदूर, किसान और जन विरोधी नीतियों के खिलाफ आगामी समय में व्यापक आंदोलन छेड़ने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए हिमाचल किसान सभा के राज्य महासचिव राकेश सिंघा, सीटू जिलाध्यक्ष कुलदीप सिंह सहित अन्य मजदूर नेताओं ने शिकागो के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की, जिन्होंने 8 घंटे के कार्य दिवस और श्रमिक अधिकारों के लिए अपने प्राण न्योछावर किए। वक्ताओं ने कहा कि 1 मई 1886 को अमेरिका में लाखों मजदूरों द्वारा शुरू किए गए ऐतिहासिक आंदोलन ने दुनिया भर में श्रमिक अधिकारों की नींव रखी। नेताओं ने कहा कि भारत में भी मजदूर आंदोलन का गौरवशाली इतिहास रहा है, जिसकी शुरुआत 1923 में कामरेड एम. सिंगारवेलु द्वारा मद्रास में लाल झंडा फहराने से हुई थी। उन्होंने हाल के वर्षों में देशभर में हुई हड़तालों और औद्योगिक क्षेत्रों में बढ़ते श्रमिक प्रतिरोध को मजदूर एकता का प्रतीक बताया।
सभा में केंद्र सरकार पर श्रम कानूनों को कमजोर करने और लेबर कोड्स के माध्यम से मजदूरों के अधिकारों को सीमित करने का आरोप लगाया गया। वक्ताओं ने कहा कि कार्यदिवस को 12 घंटे तक बढ़ाने, हड़ताल के अधिकार पर पाबंदियां और ठेका श्रमिकों को बढ़ावा देने जैसे प्रावधान मजदूरों के हितों के खिलाफ हैं। मजदूर नेताओं ने न्यूनतम वेतन बढ़ाने की मांग दोहराते हुए कहा कि वर्तमान में निर्धारित ‘फ्लोर वेज’ ₹178 प्रतिदिन मजदूरों की जरूरतों के अनुरूप नहीं है। सीटू ने अकुशल श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन ₹26,000 प्रतिमाह निर्धारित करने की मांग की है।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2019-20 में पारित चार श्रम संहिताओं को 21 नवंबर 2025 से लागू करने की अधिसूचना जारी की गई है, जिसे देश के करोड़ों मजदूरों के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया गया है। संगठन का आरोप है कि इन संहिताओं के जरिए वर्षों के संघर्ष से हासिल श्रमिक अधिकारों और श्रम कानूनों को कमजोर किया जा रहा है। नए प्रावधानों के तहत कार्यदिवस को 12 घंटे तक बढ़ाने की संभावना, हड़ताल के अधिकार पर प्रतिबंध, ठेका व फिक्स्ड टर्म रोजगार को बढ़ावा तथा गिग वर्कर्स को श्रमिक अधिकारों से वंचित करना—ये सभी कदम मजदूरों को असुरक्षा और शोषण की ओर धकेलते हैं।
सीटू ने केंद्र सरकार और बड़े कॉरपोरेट घरानों के बीच गठजोड़ का आरोप लगाते हुए कहा कि यह नीति “मुनाफे को प्राथमिकता और मजदूरों के अधिकारों की अनदेखी” पर आधारित है। साथ ही संगठन ने कहा कि श्रमिकों के खिलाफ दमन, गिरफ्तारियां और आंदोलनों को कुचलने के प्रयास लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा हमला हैं। अंत में सीटू ने चेतावनी दी कि यदि श्रमिक विरोधी नीतियों को वापस नहीं लिया गया, तो देशव्यापी आंदोलन को और तेज किया जाएगा।
