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    Shimla : किसान-बागवानों ने सचिवालय घेरा, न्यूजीलैंड के सेब पर आयात शुल्क घटाने समेत कई मुद्दों पर जोरदार प्रदर्शन

    किसान-बागवानों ने सचिवालय घेरा : शिमला में किसान-बागवानों ने न्यूजीलैंड के सेब पर आयात शुल्क घटाने, दुग्ध उत्पादकों को समय पर भुगतान, एफटीए के विरोध और फोरलेन परियोजनाओं से प्रभावितों को मुआवजे की मांग को लेकर सचिवालय का घेराव कर आक्रोश रैली निकाली।
    ARB Times DeskBy ARB Times DeskJanuary 19, 2026No Comments4 Mins Read
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    एआरबी टाइम्स ब्यूरो | शिमला

    न्यूजीलैंड से सेब आयात पर शुल्क घटाने, दुग्ध उत्पादकों को समय पर भुगतान न मिलने, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद किसानों को भूमि देने के लिए ठोस नीति न बनाए जाने और फोरलेन परियोजनाओं से प्रभावित परिवारों को मुआवजा न मिलने जैसे गंभीर मुद्दों को लेकर सोमवार को हिमाचल प्रदेश के किसान-बागवानों ने राज्य सचिवालय का घेराव किया। प्रदेश के कोने-कोने से पहुंचे किसान-बागवान टालैंड में एकत्र हुए और वहां से छोटा शिमला स्थित राज्य सचिवालय तक आक्रोश रैली निकाली। नारेबाजी करते हुए आगे बढ़ रही इस रैली के कारण टालैंड से छोटा शिमला तक यातायात बुरी तरह प्रभावित रहा।

    किसान-बागवानों का कहना है कि दिसंबर 2025 में केंद्र सरकार की ओर से न्यूजीलैंड के साथ किए गए मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) से हिमाचल के सेब उत्पादकों के सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया है। प्रदेश में ढाई लाख से अधिक सेब बागवान इस फैसले से चिंतित हैं। उनका मानना है कि न्यूजीलैंड की आड़ में अन्य देश भी सेब पर आयात शुल्क घटाने का दबाव बनाएंगे। अमेरिका सहित कई देशों के साथ भी एफटीए पर विचार चल रहा है, जिससे घरेलू सेब उद्योग पर और बड़ा खतरा मंडराने लगा है। बागवानों ने कहा कि आयातित सस्ते सेब भारतीय बाजारों में आने से हिमाचल का लगभग 5500 करोड़ रुपये का सेब उद्योग तबाह हो सकता है। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड के सेब उत्पादक भी प्रभावित होंगे। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन आयात शुल्क घटाकर घरेलू बागवानों को बर्बादी की कगार पर पहुंचाया जा रहा है।

    एफटीए के जरिए खेती को उजाड़ने का आरोप

    किसान-बागवान नेताओं ने आरोप लगाया कि केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली मोदी सरकार एफटीए के माध्यम से देश की खेती को विदेशी बाजारों के हवाले कर रही है। न्यूजीलैंड, अमेरिका और अन्य देशों से सस्ते कृषि उत्पादों के आयात ने किसानों की कमर तोड़ दी है। ऐसे हालात में किसान और बागवान सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं।

    सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनदेखी

    किसान नेता संजय चौहान ने कहा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की खुली अवहेलना कर रही है। कोर्ट के आदेशों के बावजूद किसानों को भूमि देने के लिए कोई ठोस नीति नहीं बनाई गई। इसके उलट प्रदेश में जमीन की बेतरतीब बिक्री, सेब के पेड़ों की कटाई और बड़े प्रोजेक्ट्स के नाम पर किसानों को बेदखल किया जा रहा है। पावर प्रोजेक्ट, फोरलेन और नेशनल हाईवे से प्रभावित किसान आज भी मुआवजे के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।

    दुग्ध उत्पादकों के भुगतान की मांग

    किसान-बागवानों ने दुग्ध उत्पादकों के मुद्दे को भी प्रमुखता से उठाया। उन्होंने मांग की कि सरकार हर महीने दूध की पेमेंट पहली तारीख को सुनिश्चित करे। उन्होंने कहा कि 19 जनवरी के बाद भी यदि सरकार ने आंखें मूंदे रखीं तो आंदोलन सिर्फ सचिवालय तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि गांव-गांव तक फैलाया जाएगा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि किसान-विरोधी नीतियों के चलते केंद्र सरकार ने मंडी मध्यस्थता योजना (एमआईएस) का बजट 2023 में शून्य कर दिया, जबकि राज्य सरकार भी बागवानों से खरीदे गए सेब का समय पर भुगतान नहीं कर रही है।

    फोरलेन परियोजनाओं पर वैज्ञानिक समीक्षा की मांग

    किसान सभा के राज्याध्यक्ष डॉ. कुलदीप सिंह तंवर, पूर्व विधायक राकेश सिंघा सहित बड़ी संख्या में किसान-बागवान संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए। डॉ. तंवर ने कहा कि भट्टाकुफर में सड़क धंसने और चलौंठी क्षेत्र में मकानों में दरारें आने जैसी घटनाएं फोरलेन कंपनियों की मनमानी का नतीजा हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि बिना वैज्ञानिक मानकों के हो रहे निर्माण कार्यों से कई परिवार बेघर हो चुके हैं, लेकिन न तो कंपनियों पर कार्रवाई हो रही है और न ही प्रभावितों को पर्याप्त राहत मिल रही है। किसान सभा ने मांग की कि फोरलेन निर्माण कार्यों की भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण संस्था (जीएसआई), आईआईटी रूड़की और आईआईटी मंडी जैसे विशेषज्ञ संस्थानों से वैज्ञानिक समीक्षा करवाई जाए, निर्माण से हुए नुकसान का तत्काल मुआवजा दिया जाए।

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