एआरबी टाइम्स ब्यूरो, शिमला | Himachal High Court ने समान काम के लिए समान वेतन के सिद्धांत को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की अदालत ने कहा कि यदि अलग-अलग विभागों में कार्यरत कर्मचारियों की शैक्षणिक योग्यता, काम का स्वरूप और जिम्मेदारियां एक जैसी हैं तो केवल विभाग अलग होने के आधार पर उन्हें कम वेतनमान नहीं दिया जा सकता। अदालत ने कहा कि समान काम के लिए समान वेतन महज एक नारा नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत निर्धारित संवैधानिक अधिकार है।
अदालत ने सरकार की उस दलील को भी स्वीकार नहीं किया, जिसमें कहा गया था कि वेतनमान तय करना कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र का विषय है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब समान योग्यता और समान प्रकृति के काम के बावजूद कर्मचारियों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार होता है तो न्यायपालिका इस मामले में हस्तक्षेप कर सकती है। ऐसे मामलों में अदालत मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकती।
1991 में कृषि विभाग में हुई थी नियुक्ति
याचिकाकर्ता को वर्ष 1991 में हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग के माध्यम से कृषि विभाग में आर्ट/क्राफ्ट टीचर के पद पर नियुक्त किया गया था। उनकी नियुक्ति 950-1800 रुपये के वेतनमान में हुई थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि समान शैक्षणिक योग्यता और उसी चयन प्रक्रिया के आधार पर ग्रामीण विकास विभाग में कार्यरत जूनियर टेलरिंग मिस्ट्रेस को 1350-2400 रुपये का अधिक वेतनमान दिया जा रहा था। इस अंतर को दूर करने के लिए उन्होंने सरकार के समक्ष प्रतिवेदन प्रस्तुत किया था।
सरकार ने खारिज कर दिया था प्रतिवेदन
सरकार ने याचिकाकर्ता के प्रतिवेदन को खारिज करते हुए दलील दी थी कि उन्होंने नियुक्ति के समय निर्धारित वेतनमान को स्वीकार किया था। सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि उच्च वेतनमान देना पंजाब पैटर्न के नियमों के अनुरूप नहीं होगा। सरकार के इस निर्णय से असंतुष्ट याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया। अदालत के समक्ष मुख्य सवाल यह था कि समान योग्यता, चयन प्रक्रिया, कार्य की प्रकृति और जिम्मेदारियां होने के बावजूद केवल विभाग अलग होने के कारण अलग वेतनमान निर्धारित किया जा सकता है या नहीं।
