एआरबी टाइम्स ब्यूरो, शिमला। हिमाचल प्रदेश सरकार की ओर से पूर्व मुख्य संसदीय सचिवों (सीपीएस) की नियुक्तियां रद्द होने के बावजूद उन्हें सरकारी बंगले आवंटित रखने पर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। चीफ जस्टिस गुरमीत सिंह संधावालिया और जस्टिस बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने इस मामले पर गहरी हैरानी जताते हुए मुख्य सचिव को व्यक्तिगत हलफनामा दायर करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने सुनवाई के दौरान तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रदेश में “मुझे चेहरा दिखाओ, मैं तुम्हें नियम दिखा दूंगा” की नीति के तहत काम किया जा रहा है।
बिना आवेदन नियमित कर दिया आवास आवंटन
हाईकोर्ट ने पाया कि पूर्व सीपीएस ने सरकारी आवास के लिए आवेदन तक नहीं किया था, फिर भी सरकार ने विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए 14 नवंबर 2024 से सामान्य लाइसेंस शुल्क पर उनके प्रवास को नियमित कर दिया। अदालत ने कहा कि यदि इस मुद्दे पर नोटिस जारी न किया गया होता, तो सरकार इस पूरे मामले को कालीन के नीचे दबाए रखती। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा है कि पूर्व सीपीएस को विशेष छूट देने वाले 4 मई के फैसले पर क्यों न रोक लगा दी जाए।
नवंबर 2024 में हाईकोर्ट ने रद्द की थीं नियुक्तियां
गौरतलब है कि प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने 8 जनवरी 2023 को छह विधायकों को मुख्य संसदीय सचिव नियुक्त किया था। इनमें:
सुंदर सिंह ठाकुर (कुल्लू)
मोहन लाल ब्राक्टा (रोहड़ू)
संजय अवस्थी (अर्की)
आशीष बुटेल (पालमपुर)
राम कुमार चौधरी (दून)
किशोरी लाल (बैजनाथ) शामिल थे।
भाजपा नेताओं की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 13 नवंबर 2024 को इन सभी छह सीपीएस की नियुक्तियों को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था और उनसे सभी सरकारी सुविधाएं तुरंत वापस लेने का आदेश दिया था। हालांकि, 22 नवंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले के कुछ हिस्सों पर अंतरिम राहत प्रदान की थी, लेकिन सीपीएस का पद बहाल नहीं किया गया था। इस पूरे मामले में अब अगली सुनवाई 19 अगस्त को होगी।
