एआरबी टाइम्स ब्यूरो | शिमला
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पौंग बांध विस्थापितों के पुनर्वास में हो रही वर्षों की देरी और उन्हें दूरदराज के मरुस्थलीय इलाकों में जमीन आवंटित करने के मुद्दे पर राजस्थान सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने मिलाप सिंह की ओर से दायर अनुपालना याचिका पर सुनवाई करते हुए यह कड़ा रुख अपनाया।
अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पौंग बांध के पानी का पूरा लाभ उठाने के बाद राजस्थान सरकार विस्थापितों के पुनर्वास की जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकती। सरकार विस्थापितों को जैसलमेर के रेगिस्तान में धकेलने के बजाय हिमाचल प्रदेश के नजदीक फेज-1 वाले क्षेत्रों (जैसे श्रीगंगानगर) में जमीन उपलब्ध कराए।
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अवैध कब्जों का बहाना बनाकर जिम्मेदारी से नहीं भाग सकती सरकार
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान राजस्थान सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए प्रमुख बिंदु रेखांकित किए:
फेज-1 की जमीन पर हक: फेज-1 की विवादमुक्त जमीन पर अतिक्रमण का हवाला देकर पात्र विस्थापितों को जमीन आवंटन से वंचित करना पूरी तरह से अनुचित है। सार्वजनिक भूमि से अवैध कब्जे हटाकर विस्थापितों को जमीन का कब्जा देना राजस्थान सरकार का दायित्व है।
सुविधाओं का अभाव: फेज-2 के तहत जैसलमेर में दी जा रही जमीन फेज-1 के श्रीगंगानगर क्षेत्र से करीब 600 किलोमीटर दूर है, जहां मूलभूत सुविधाओं का भारी अभाव है।
केंद्र सरकार को निर्देश: हाईकोर्ट ने केंद्रीय सचिव को राजस्थान सरकार के इस अड़ियल रवैये पर कड़ा संज्ञान लेने और नई स्टेटस रिपोर्ट (Status Report) दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 8 अक्टूबर को तय की गई है।
50 वर्षों से भटक रहे विस्थापित: आंकड़ों में स्थिति
हिमाचल का काम पूरा: हिमाचल प्रदेश ने 1,003 अदालती मामलों में से 969 मामलों का निपटारा कर फाइलें राजस्थान को भेज दी हैं।
राजस्थान में लंबित मामले: राजस्थान सरकार के पास अभी भी 265 मामले लंबित हैं।
बैठकों की सुस्त रफ्तार: केंद्र के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद दोनों राज्यों के बीच नियमित मासिक बैठकें नहीं हो रही हैं। जनवरी 2025 के बाद केवल एक बैठक हुई, जिसमें महज 50 विस्थापितों को जमीन आवंटित की गई।
गौरतलब है कि वर्ष 1971 में पौंग बांध निर्माण के समय हिमाचल के हजारों परिवार बेघर हुए थे। कुल 16,352 विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के लिए राजस्थान के गंगानगर जिले में 2.20 लाख एकड़ भूमि आरक्षित की गई थी, लेकिन पांच दशक बीत जाने के बाद भी सैकड़ों परिवार अपने अधिकार के लिए भटक रहे हैं।
