एआरबी टाइम्स ब्यूरो | शिमला
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य में न्यायिक बुनियादी ढांचे, नई अदालतों के गठन और सहायक कर्मचारियों (स्टाफ) की भर्ती में राज्य सरकार की ओर से की जा रही टालमटोल और वित्तीय तंगी के तर्कों पर गहरा असंतोष व्यक्त करते हुए कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार को आगामी आदेशों से पहले आवश्यक कदम उठाने के सख्त निर्देश दिए हैं। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि वर्षों से लंबित तार्किक जरूरतों और सिफारिशों पर फैसला न लेना दुखद है। सरकार का यह रवैया कोर्ट को पदों के सृजन और स्टाफ बहाली का सीधा परमादेश (Mandamus) जारी करने पर मजबूर कर रहा है। मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को निर्धारित की गई है।
‘अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित न्याय मौलिक अधिकार’
खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि राज्य सरकार की वित्तीय तंगी नागरिकों के त्वरित न्याय पाने के मौलिक अधिकार (संविधान का अनुच्छेद 21) को रोकने का आधार नहीं हो सकती।
बजट आवंटन पर चिंता: कोर्ट ने हैरानी जताई कि न्यायपालिका के लिए राज्य के कुल बजट का एक प्रतिशत का भी बहुत छोटा हिस्सा (वित्तीय वर्ष 2025-26 में मात्र 0.46% और आगामी वर्ष के लिए 0.53%) आवंटित किया जा रहा है, इसके बावजूद सरकार आवश्यक प्रस्तावों को दबा रही है।
हाईकोर्ट की ओर से उजागर की गईं प्रमुख खामियां:
अदालतों के गठन में मनमानी: पिछले 3 वर्षों से अतिरिक्त जिला न्यायाधीशों के 3 पद और सिविल जजों के 34 पद सृजित करने के प्रस्ताव लंबित हैं। कैबिनेट ने हाईकोर्ट की मांग वाली 34 अदालतों के बजाय उन दो अदालतों (हरोली और बडाणा) को मंजूरी दे दी, जिनकी मांग ही नहीं की गई थी।
कर्मचारियों के पदों पर टालमटोल: नई स्वीकृत अदालतों के साथ जजमेंट राइटर/स्टेनोग्राफर ग्रेड-III और रिकॉर्ड कीपर जैसे अनिवार्य कर्मचारियों के पद स्वीकृत करने में सरकार लगातार देरी कर रही है।
वाहनों के फंड पर रोक: हाईकोर्ट के जजों और विभिन्न जिला अदालतों (कुल्लू, बिलासपुर, चंबा, ऊना, मंडी, शिमला, लाहौल-स्पीति, सोलन, हमीरपुर आदि) के जजों के लिए स्वीकृत वाहनों (इनोवा क्रिस्टा, मारुति ग्रैंड विटारा, थार रॉक्स) के फंड और वितरण की प्रक्रिया अभी भी अटकी हुई है।
स्थायी लोक अदालत अधिसूचना में त्रुटि: 10 अगस्त 2026 की अधिसूचना के जरिए स्थायी लोक अदालतों में सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीशों को अंशकालिक सदस्य के रूप में अधिसूचित किया गया है, जो बहु-सदस्यीय निकाय के नियमों के विपरीत है। कोर्ट ने इसमें तुरंत सुधार करने के आदेश दिए हैं।
